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हम पहुँच ही गए, अपने अपने घर – Poem By Pro. Mrudul Nile

हम पहुँच ही गए, अपने अपने घर !  

Pro. Mrudul Nile 

हम पहुँच गए !
हम पहुँच ही गए,
अपने अपने घर,
रक्त से रंजित, पाओं मे छाले, भूकें, चलते रुकते,
पर पहुँच ही गए हम।

हम निकलेंथे तीन लोग,
मैं, वो और हमारी मुन्नी,
हम तो पहुँच गए, हमारी मुन्नी चल नहीं पायी..
हाथ मे रोटी का एक टुकड़ा देकर,
वही रास्ते मे दफ़ना आए,
पर फिर भी हम पहुँच गए..

एक औरत को रास्ते मे मैंने बच्चा जनते देखा,

फिर एक दिन बाद वही औरत एक हाथ मे बच्चा और गर्भनाल लिए चलती दिखी, पर अब पता चला है के
वह भी पहुँच चुकी हैं।

आपने तो देखा ही होगा,
वोह अध मरासा मज़दूर अपनी बूढ़ी माँ को
काँधे पर लिए एक शून्य की ओर चल रहा था..

अभी उसके बारे में नहीं पता चला,
पर आपकी तरह हमें भी यक़ीन है,
वह भी पहुँच गयें होंगे।

क्या आपने उन बच्चों की आँखों मे वही सवाल देखे है जिसका जवाब हम ढूँढ रहे है?
अगर घर जा रहे है,
तो दादी के लिए मिठाई का डिब्बा क्यों नहीं लिया?
स्कूल कब खुलेगा?
कब वापस आएँगे?
अभी उन्हें यह नहीं बताया हैं के चल कर जना है,
वर्ना वो यह पूछ बैठेंगे..
क्या मुन्नी चल पायी थी?

आप तो रामायण में व्यस्त थे, जब कुछ लोग हमें खना खिला रहे थे..
यह लोग,
आपके पक्ष से नहीं थे..
किसी भी पक्ष के नहीं थे,
इसलिए वे हमारे थे…

हम घर पहुँचने तक
कम से कम गुड और पानी का इंतज़ाम करते…
वे इंसान थे।

आपको हमारा अखरी ख़त, हम पहुँच चुके।

 

मृदुल निले, मुम्बई

प्राध्यापक राज्यशास्त्र विभाग, मुंबई विद्यापीठ 

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