कैसे हिन्दी के पाठकों को अंधेरे में रखने का प्रोपेगैंडा गढ़ा जाता है.
कैसे हिन्दी के पाठकों को अंधेरे में रखने का प्रोपेगैंडा गढ़ा जाता है.
कैसे हिन्दी के पाठकों को अंधेरे में रखने का प्रोपेगैंडा गढ़ा जाता है.

कैसे हिन्दी के पाठकों को अंधेरे में रखने का प्रोपेगैंडा गढ़ा जाता है.

रवीश कुमार

कैसे हिन्दी के पाठकों को अंधेरे में

रखने का प्रोपेगैंडा गढ़ा जाता है.

 

रवीश कुमार

 

 

 

7/6/2021,

4 जून को हिन्दुस्तान ने पहले पन्ने पर यह ख़बर छापी थी कि कि अगस्त से स्वदेशी टीका मिलने लगेगा। हैदराबाद की कंपनी BIOLOGICAL E को पंद्रह सौ करोड़ का आर्डर दिया गया है। अख़बार लिखता है कि BIOLOGICAL E को विकसित किया है। अख़बार ने यह भी लिखा है कि “BIOLOGICAL E के टीके की ख़रीद की यह व्यवस्था स्वदेशी टीका निर्माताओं को प्रोत्साहित करना है। सरकार स्वदेशी कंपनियों के टीकों को प्रोत्साहित कर रही है।” अख़बार की यह पंक्ति है। वैक्सीन संबंधी प्रयोग का काम फरीदाबाद की संस्था ट्रांसनेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान के ज़रिए किया गया है। हिन्दुस्तान अख़बार की पहली ख़बर है फिर भी BIOLOGICAL E के बारे में कोई जानकारी पहले पन्ने पर नहीं है। टीके का नाम क्या है इसकी भी जानकारी नहीं है।

ET Now चैनल के न्यूज़ वीडियो मिला। इस वीडियो क्लिप में रिपोर्टर बताती है कि
BIOLOGICAL E ने ख़ुद ही सरकार से पंद्रह सौ करोड़ मांगे थे। सरकार ने ख़ुद से नहीं दिए कि लो स्वदेशी टीके की खोज करो। रिपोर्टर नाम नहीं बता पाती है कि कंपनी के टीके का नाम क्या होगा और दूसरी लाइन पर शिफ़्ट कर जाती है कि टीके का ट्रायल के तीसरे चरण में है और यह कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन के साथ भी उनका टीका बनाने का करार कर रही है। कई बार लाइव कवरेज में पूरा बताने का समय भी नहीं मिलता है। हैदराबाद से छपने वाले अख़बार Deccan Herald ने लिखा है कि BIOLOGICAL E के टीके का नाम है CORBEVAX जिसकी खोज टैक्सस की संस्था ने की है।

“Biological-E COVID Vaccine candidate has been supported by Government of India from Preclinical stage to Phase-3 studies. Department of Biotechnology has not only provided financial assistance in terms of grant-in-aid of over Rs 100 cr but has also partnered with Biological-E to conduct all animal challenge and assay studies through its Research Institute Translational Health Science Technology Institute (THSTI), Faridabad.”

यह उस दिन जारी PIB की प्रेस रिलीज़ में कहा गया है। इसमें यह नहीं लिखा है कि यह वैक्सीन टैक्सस की कंपनी के द्वारा विकसित किया गया है। फिर डेक्कन हेरल्ड और टाइम्स आफ इंडिया क्या किसी और वैक्सीन की बात कर रहे हैं? क्या सरकार किसी और टीके की बात कर रही है? कई प्रकार की अस्पष्टता है।कई प्रकार की अस्पष्टता है। ज़ाहिर है अख़बार ने इसे ही उठा कर छाप दिया। कोई भी छाप देगा कि सरकार कह रही है। तो फिर अंग्रेज़ी के अख़बारों ने क्या मनगढ़ंत कहानी बनाई है?

ravish kumar
ravish kumar

यही समझना है आपको। किस तरह मीडिया आपकी नज़रों के सामने से सारे तथ्यों को ग़ायब कर ख़बरों को इस तरह लिख रहा है जिसमें मोदी महान की ध्वनि सुनाई देती रहे। आज इस वैक्सीन के बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया में और भी विस्तार से ख़बर छपी है। हिन्दुस्तान ने स्वदेशी लगाकर पाठकों को भ्रमित करने का प्रयास किया है। बस मोदी टीका लिखना बाकी रह गया था और यह छूट गया होगा कि मोदी जी ने इस टीके की खोज की है। वे हर दिन चुनावी रैली से लौटते वक्त जहाज़ में इस पर शोध करते थे। जहाज़ में ही मोदी जी की प्रयोगशाला है।

7 जून के टाइम्स ऑफ इंडिया के दूसरे पन्ने पर इसी ख़बर के बारे में कुछ और छपा है। लिखा है कि हैदराबाद की BIOLOGICAL E में बनने वाला CORBEVAX का टीका काफी सस्ता होगा। इस टीके का विकास अमरीका के टैक्सस शहर की एक संस्था ने किया है। जिसका नाम है Texas Children Hospital Centre for Vaccine Development at Baylor College of Medicine ने किया है। इस संस्था ने सार्स के समय ही एक टीका बनाया था। उस समय की तकनीकि का फायदा उठा कर कोविड का टीका बनाने की कोशिश थोड़ी धीमी हो गई है क्योंकि इसके पास पैसे नहीं थे। तो शहर की एक कंपनी मदद के लिए आगे आई। यह कंपनी वोदका बनाती है जो एक किस्म की शराब होती है। टीका बनाने वाली कंपनी के प्रमुख का नाम PETER HOTEZ है।

यह कंपनी पेटेंट में यकीन नहीं करती है। इसकी तकनीक से कोई भी टीका बना सकता है। अपना सारा डेटा पब्लिक में डाल देती है ताकि कम आय वाले देश इसका इस्तमाल कर सकें। कंपनी के प्रमुख का कहना है कि यह टीका पैसा कमाने की मशीन नहीं है। लोगों के लिए है।

ravish kumar
ravish kumar

हिन्दुस्तान अख़बार को हेडलाइन बनाने में सावधानी बरतनी चाहिए थी। इस वक्त स्वदेशी का जो मतलब है वह आज़ादी के आंदोलन के समय के स्वदेशी से अलग है। बंग विभाजन के स्वदेशी आंदोलन के जैसा भी नहीं है। पिछले साल मोदी सरकार ने ग्लोबल बनाम लोकल का नारा दिया था। इसी स्लोगन की आड़ में सरकार भी टीके को लेकर भ्रामक बयान देती रही है जिससे लोगों को बेवकूफ बनाया जा सके कि टीके की खोज भारत में भी हुई है और भारत के वैज्ञानिकों ने की है।सीरम इंस्ट्टीयूट में जो टीका बन रहा है उसकी खोज भारत के वैज्ञानिकों ने नहीं की है। न उसमें भारत सरकार का कोई योगदान है। सीरम के टीके की खोज एस्ट्रा ज़ेनका कंपनी और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थाओं ने मिल कर की है।प्रधानमंत्री भी साफ नहीं करते हैं कि सीरम जो टीका बना रहा है उसमें भारत और भारत के वैज्ञानिकों का कुछ नहीं है। दूसरी संस्थाओं ने पैसा लगाया और टीका बनाने और पैकिंग का काम सीरम को दिया।

अगर भारत के वैज्ञानिकों ने टीके की खोज की है तो यह गर्व की बात है। फिर हम अभी तक उन वैज्ञानिकों के नाम क्यों नहीं जानते हैं। उनका चेहरा तक नहीं देखा है। गोदी मीडिया के लिए इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था। दिन रात उनका इंटरव्यू चलता। उनके जीवन संघर्ष की गाथा सुनाई जा रही होती। मुमकिन है वैज्ञानिक भी सरकार को श्रेय देते और मोदी जी का नाम लेते हुए बखान करते। फिर भी गोदी मीडिया इन वैज्ञानिकों के बारे में अब तक पता नहीं कर सका है। आगे का पता नहीं।

भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट में नहीं कहना पड़ता कि भारत बायोटेक और सीरम को टीके के विकास और रिसर्च के लिए एक नया पैसा नहीं दिया गया है। जब आपने पैसा ही नहीं दिया तो फिर सारा श्रेय कैसे ले रहे हैं।

एक पाठक क्या करे। क्या उसे एक अखबार और एक चैनल की ख़बर से संतुष्ट हो जाना चाहिए? तब क्या होगा कि जब ज़्यादातर अख़बारों में एक ही तरह की ख़बरें छपने लगे। अभी तो कुछ कुछ ख़बरे थोड़े बहुत अंतर के साथ छप जा रही है लेकिन ज़्यादातर ख़बरों में आप अंतर नहीं देखेंगे। फिर भी हिन्दी के पाठक को सोचना चाहिए कि अख़बार और चैनल क्या उन्हें बेवकूफ बनाने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं? क्या उन्हें बेवकूफ बनाए जाने का यह अपमान बर्दाश्त कर लेना चाहिए?

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